Thursday, December 3, 2015

प्रेस वक्तव्य 1/12/15 :

हाइड्रो परियोजनाओं की लापरवाही लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन गई है
पिछले दो हफ़्तों के दौरान आधा दर्ज़न लोगों को अपनी जिंदगियां गंवानी पड़ी हैं. इन सभी में एक बात शामिल थी . यह सभी लोग हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की साईट पर मरे हैं. पहली घटना 18 नवम्बर 2015 को घटित हुई, बुरंग गाँव में 100 मेगावाट के सोरंग हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट का पेनस्टॉक पाईप फट गया जिसमें तीन लोगों की मृत्यु हो गयी. इस घटना के चार ही दिन बाद ही चगाओं गाँव में भू-स्खलन हुआ जो करछम वांग्तु प्रोजेक्ट की सुरंग के पास ही बसा हुआ है. इस घटना में संपत्ति का नुकसान हुआ लेकिन संयोग से किसी की जान नहीं गयी. 29 नवम्बर को ही 450 मेगावाट शोंगथोंग करछम परियोजना में ब्लास्टिंग का काम करते हुए दो मजदूरों की मौत हो गयी और अन्य कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. उसी दिन भाभा घाटी में एक शिक्षक की मृत्यु भू-स्खलन में हो गयी . कुछ दिन पहले पान्वी गाँव के लोगों ने शिमला में विरोध प्रदर्शन किया था क्यों कि रल्ला तरंडा परियोजना के भूमिगत निर्माण कार्य की वजह से उनके घरों में दरारें पड़ने लगीं हैं.
अब समय आ गया है कि हिमाचल सरकार की खुमारी उतर जानी चाहिये. क्योंकि यह घटनाएँ महज़ सामान्य दुर्घटनाएं नहीं हैं. बल्कि यह राज्य में बनने वाले हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट में बरती जाने वाली लापरवाही का परिणाम हैं. लापरवाही दो स्तरों पर दिखाई देती है. पहली, पर्यावरणीय और सुरक्षा के नियमों के प्रति परियोजना प्रबंधन और सरकार के द्वारा बरती जा रही लापरवाही . दूसरी नियम विहीन हाइड्रोपावर का विकास. दोनों ही तरह के मामलों में परियोजना प्रबंधन की उदासीनता और स्थानीय जनता और पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा उठाये गए मुद्दों के प्रति लापरवाही साफ़ दिखाई दिखाई देती है.
हम बहुत लंबे समय से भूगर्भीय, पर्यावरणीय, जल प्रबंधन की दृष्टि से नाज़ुक इलाके किन्नौर में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के प्रभावों के बारे में बता रहे हैं. सरकार ने हमेशा ही इन प्रभावों की अनदेखी करी है बल्कि हर प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए बहाने बाज़ी का सहारा लिया है और इनके दुष्परिणामों को जनता से छिपाने की कोशिशें करी हैं. उदहारण के लिए किन्नौर में ढालदार जगहों पर भूस्खलन के असल कारण जानने के लिए बिना कोई स्वतंत्र अध्यन करवाए ही बरसात के कम ज़्यादा होने को, या बाढ़ को, या किसी अन्य प्रकृतिक घटना को ज़िम्मेदार बता दिया जाता है. परियोजना प्रबंधन मूर्खतापूर्ण नतीजे निकालने में यहाँ तक कह देते हैं कि इन इलाकों में तो इस तरह के भू-स्खलन होना एक सामान्य प्रकृतिक घटना है. अगर ऐसा ही है तब तो इस तरह की करछम वांग्तु जैसी विनाशकारी परियोजनाओं में निर्माण को और भी नियमों के तहत और कड़ी देखरेख में बनाया जाना चाहिये था . लेकिन इस तरह के किसी भी प्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं है .
जहां तक सुरक्षा और देखरेख से जुड़े मुद्दों का सम्बन्ध है पिछले दो हफ़्तों में किन्नौर में हुई घटनाओं जैसी ही पिछले वर्षों में ऐसे अनेकों घटनाएँ हुई हैं. चमेरा III परियोजना में रिसाव की वजह से मोखर गाँव का आबादी का इलाका बह गया था .कुल्लू के अलियो–II परियोजना के जल भराव की जांच के समय मजदूरों की बस्ती बह गयी थी, हांलाकि इसमें किसी की मृत्यु नहीं हुई. इसी तरह का रिसाव करछम वांग्तु प्रोजेक्ट में सन 2011 में देखा गया था लेकिन यहाँ हम अभी भी दुर्घटना होने का इंतज़ार ही कर रहे हैं. हांलाकि जल विद्युत परियोजना नीति 2006 यह अनिवार्य कहा गया था कि सुरक्षा देखरेख अभिकरण का निर्माण करना अनिवार्य होगा, लेकिन अभी तक ऐसे किसी भी अभिकरण की स्थापना करी ही नहीं गयी है.
सन 2013 में Department of Power and MPP नें जलविद्युत परियोजनाओं के लिए सेफ्टी अथॉरिटी के गठन के लिए एक अधिसूचना जारी करी थी . सरकार को इस अभिकरण द्वारा पिछले दो सालों में किये गए कामों का खुलासा जनता के सामने करना चाहिये. जनता को जानने का ह्क़ है कि इस अभिकरण की बैठक कितने समय पर हुई हैं ? इस ने कौन सी परियोजनाओं की जांच करी है ? आज तक इसने किस दुर्घटना और लापरवाही के बारे में कोई कार्यवाही करी है. इसे जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिये जो कि इस तथाकथित विकास का नुकसान झेल रही है.

इस अभिकरण को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि सोरंग 100 मेगावाट परियोजना के पेनस्टॉक पाईप में रिसाव के बारे में गाँव वालों नें कंपनी को 8th मई 2015 को ही सूचना दे दी थी . इसका मतलब है कि इस परियोजना में पहले से ही कोई तकनीकी खामी थी . लेकिन इसके बावजूद भराव क्षमता की जांच की कार्यवाही क्यों करी गयी . इसके अलावा इसे इस बात की भी जांच करनी चाहिये कि जिस रात पेनस्टॉक क्षमता की जांच करी जा रही थी और दुर्घटना हुई थी लोगों को कोई चेतावनी या सूचना क्यों नहीं दी गयी ?
आज बुरंग गाँव लोगों के सिरों पर लटकते हुए मलबे के ढेर में बदल चुका है . हमें आश्चर्य है कि कंपनी ने रिहाइशी इलाके में निर्माण की हिम्मत ही कैसे करी ? चाहे वह साल के कुछ हिस्से के लिए तात्कालिक तौर पर ही करी गयी हो. आज कभी भी तेज बारिश या भूकंप के धक्के से बहुत से लोगों की जान जा सकती है. जिसे किसी भी कीमत पर बचाया जाना चाहिये. वह सभी परिवार जो कि बुरंग में रह रहे हैं उनकी जिंदगी की रक्षा करी जानी चाहिये ताकि कंपनी की लापरवाही की वजह से होने वाली किसी और दुर्घटना में उनकी जान ना जाए, और इन यह लोगों की जिंदगी की सुरक्षा प्रशासन की भी पूरी जिम्मेदारी है .
आज यह बात बिलकुल साफ़ हो गयी है कि भू स्खलन, बड़े पैमाने पर मिट्टी कटाव, गैरकानूनी मलबा डम्पिंग , जल स्रोतों का सूखना, जल भराव स्रोतों का कम हो जाना, जंगल कटान के कारण मिट्टी कटाव को रोकने में केन्द्रीय और राज्य के नियामक और देखरेख संस्थाएं पूरी तरह विफल सिद्ध हुई हैं. इसके स्थानीय वनस्पति, फल और सब्ज़ी उत्पादन और लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी पर पड़ने वाले खतरे के बारे में स्थानीय लोगों द्वारा बार बार आवाज़ उठाई जाती है लेकिन सरकार हमेशा ऐसे मामलों में अंधी बनी रहती है.

Issued by
Manshi Asher, Prakash Bhandari and Sumit Mahar
Himdhara Environment Research and Action Collective 8988275737 

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